देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर विवाद तेज हो गया है। विपक्षी दलों और युवा समूहों ने आरोप लगाया है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पात्र मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। Reuters की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है।
13 करोड़ नाम हटने का आंकड़ा क्या बताता है?
Reuters की रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों और आलोचकों के हवाले से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का मुद्दा सामने आया। Reuters की 12 अक्टूबर की रिपोर्ट में हटाई गई प्रविष्टियों के अलग-अलग वर्गों का उल्लेख है—लगभग 2.8 करोड़ मृत मतदाता, 6.3 करोड़ स्थानांतरित मतदाता और 3 करोड़ ऐसे मतदाता जिनका पता नहीं चल पाया। इन आंकड़ों को समझते समय जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से हटाई गई प्रविष्टियों, सत्यापन के लिए चिह्नित मतदाताओं और अंतिम मतदाता सूची से वास्तव में बाहर रह गए पात्र नागरिकों के बीच अंतर किया जाए। चुनाव आयोग ने 13.39 करोड़ नाम हटने के दावे के संदर्भ में कहा कि संबंधित प्रविष्टियों को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट जैसी श्रेणियों में रखा गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हटाए गए सभी नाम पात्र मतदाताओं के थे या सभी मामलों में गलत तरीके से नाम काटे गए।
चुनाव आयोग का पक्ष और विपक्ष की आपत्तियां
केंद्र सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, चुनाव आयोग SIR के दौरान घर-घर सत्यापन, ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन और दावे-आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर देता है। आधिकारिक जानकारी में यह भी कहा गया है कि किसी मतदाता को अनुपस्थित मानने से पहले बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) द्वारा कम-से-कम दो से तीन बार संपर्क करने का प्रयास किया जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया और कारणों का रिकॉर्ड जरूरी है। सत्यापन, पर्यवेक्षी जांच और हटाई गई प्रविष्टियों के नमूना ऑडिट जैसे उपाय भी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। सरकार का कहना है कि पात्र मतदाताओं को नाम शामिल कराने या रिकॉर्ड में सुधार के लिए निर्धारित फॉर्म और अपील व्यवस्था उपलब्ध है।
विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कम समय-सीमा, पुराने दस्तावेजों की मांग और केंद्रीकृत डिजिटल प्रक्रिया से गरीबों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और ऐसे लोगों को कठिनाई हो सकती है जिनके पास पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने यह भी आरोप लगाया है कि नाम हटने का असर कुछ समुदायों पर असमान रूप से पड़ा है। ये आरोप हैं; हर मामले में गलत तरीके से नाम हटाए जाने या किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचने की बात को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने मतदाता सूची और डिजिटल प्रक्रिया से जुड़े कुछ फैसलों पर औपचारिक आपत्तियां भी दर्ज की थीं। आयोग ने संस्थागत मतभेदों को सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। इस विवाद के बीच पारदर्शिता, स्थानीय अधिकारियों की भूमिका और शिकायतों के प्रभावी निपटारे पर सवाल उठ रहे हैं।
चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। आधिकारिक विवरण के अनुसार, अदालत ने मतदाता सूची को सटीक बनाने के लिए आयोग की वैधानिक भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकता का अंतिम निर्धारण करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर दायर याचिका पर चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा। यह नोटिस अपने आप में आरोपों को सही साबित करने वाला अंतिम फैसला नहीं है। इससे पहले आयोग ने उन पात्र मतदाताओं को नाम शामिल कराने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया था जो पुनरीक्षण के दौरान सूची से छूट गए हों।
जिन नागरिकों को लगता है कि उनका नाम गलती से हट गया है या सूची में दर्ज नहीं है, वे अपने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) या BLO से संपर्क कर सकते हैं। नए नाम के पंजीकरण के लिए सामान्यतः Form 6, मतदाता सूची में प्रविष्टि हटाने से संबंधित दावे के लिए Form 7, और विवरण में सुधार या पते के बदलाव जैसी स्थितियों में Form 8 उपयोग किया जाता है। आवेदन के साथ संबंधित दस्तावेज जमा करें और उसकी रसीद या आवेदन संख्या सुरक्षित रखें। यदि आवेदन अस्वीकार होता है या नाम हटाने पर आपत्ति है, तो संबंधित निर्वाचन अधिकारी से लिखित कारण मांगें और लागू नियमों के अनुसार अपील करें। नाम की स्थिति की पुष्टि आधिकारिक मतदाता सेवा पोर्टल या राज्य निर्वाचन कार्यालय से करें। केवल सोशल मीडिया पोस्ट या अपुष्ट सूचियों के आधार पर यह निष्कर्ष न निकालें कि किसी व्यक्ति का मतदान अधिकार अंतिम रूप से समाप्त हो गया है।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सटीक बनाना है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि सत्यापन पारदर्शी हो, पात्र नागरिकों को सुनवाई मिले और गलत तरीके से हटाए गए नाम समय पर बहाल किए जा सकें। विवाद का समाधान आधिकारिक आंकड़ों, निष्पक्ष जांच और प्रभावी शिकायत निवारण से ही संभव है। यह रिपोर्ट Reuters, चुनाव आयोग से संबंधित आधिकारिक जानकारी और प्रकाशित कानूनी रिपोर्टों पर आधारित है। नाम हटने के आंकड़ों, राजनीतिक आरोपों और आयोग के स्पष्टीकरण को अलग-अलग प्रस्तुत किया गया है। अदालत में लंबित आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष न समझें। खबर से संबंधित सुझाव या सुधार के लिए WhatsApp करें: 9279009245।
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