काठमांडू रिंग रोड विस्तार प्रोजेक्ट अटका, भूमि विवाद पर समिति गठित
राजधानी की महत्वाकांक्षी योजना पर लगा ब्रेक: मुआवजे को लेकर भू-स्वामियों का उग्र विरोध; गतिरोध दूर करने नेपाल सरकार ने बनाई उच्चस्तरीय कमेटी
📍 काठमांडू (नेपाल) | विशेष ग्राउंड रिपोर्ट
नेपाल की राजधानी काठमांडू की सबसे महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक ‘काठमांडू रिंग रोड विस्तार परियोजना’ (Kathmandu Ring Road Expansion Project) का निर्माण कार्य अचानक ठप हो गया है। शहर में लगातार बढ़ रही भीषण यातायात समस्या को दूर करने के लिए तैयार की गई इस बहुप्रतीक्षित योजना पर भूमि अधिग्रहण और उचित मुआवजे से जुड़े गंभीर विवाद के कारण फिलहाल ब्रेक लग गया है।
काठमांडू रिंग रोड चौड़ीकरण का कार्य भूमि अधिग्रहण विवाद के चलते पूर्णतः स्थगित।
काठमांडू घाटी की जीवन रेखा मानी जाने वाली इस रिंग रोड के विस्तार का मुख्य उद्देश्य मौजूदा संकरी सड़क को चौड़ा और आधुनिक मानकों के अनुरूप मजबूत बनाना था, ताकि पूरी घाटी में ट्रैफिक का सुगम प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके। हालांकि, विस्तार के लिए आवश्यक निजी भूमि के अधिग्रहण को लेकर स्थानीय निवासियों और भू-स्वामियों ने कड़ा एतराज जताया है।
प्रभावित भूमि मालिकों का आरोप है कि सरकार द्वारा तय की गई मुआवजे की दरें मौजूदा बाजार मूल्य की तुलना में काफी कम हैं, जिससे उनकी आजीविका और आवास दोनों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। स्थानीय लोगों ने सरकार पर पारदर्शिता की कमी और एकतरफा फैसले लेने का भी आरोप लगाया है। कई स्थानों पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद निर्माण कंपनियों को अपनी भारी मशीनरी हटानी पड़ी है, जिससे उन्हें दैनिक आधार पर बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
🏛️ समाधान के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन
बढ़ते गतिरोध और प्रोजेक्ट में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए नेपाल सरकार ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, बुनियादी ढांचा विशेषज्ञों और स्थानीय प्रभावित भू-स्वामियों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है।
सर्वसम्मत हल निकालने और न्यायसंगत मुआवजा पुनर्मूल्यांकन के लिए बातचीत का दौर शुरू।
गठित समिति का मुख्य दायित्व दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर सर्वसम्मत रास्ता निकालना और न्यायसंगत मुआवजे का नया खाका तैयार करना है। सरकारी प्रवक्ता ने आश्वस्त किया है कि किसी भी नागरिक के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और सभी पक्षों की सहमति के बाद ही निर्माण कार्य पुनः प्रारंभ किया जाएगा।
यह विवाद इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि बिना व्यापक जन-सहमति और पारदर्शी नीतियों के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करना कितना चुनौतीपूर्ण है। अब सभी की निगाहें सरकार द्वारा बनाई गई समिति की आगामी रिपोर्ट और सिफारिशों पर टिकी हैं।


