
Karnataka PRC News: कर्नाटक सरकार द्वारा जारी नए परमानेंट रेजिडेंशियल सर्टिफिकेट (PRC) नियमों पर मचा बवाल। जानिए क्या है चुनाव आयोग का SIR प्रोसेस और बीजेपी क्यों जता रही है आपत्ति।
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Karnataka Permanent Resident Certificate Rules: कर्नाटक में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद अब वोटर लिस्ट (Electoral Rolls) को लेकर एक नया सियासी ड्रामा शुरू हो गया है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने चुनाव आयोग (ECI) के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के बीच एक बड़ा फैसला लेते हुए ‘स्थायी निवासी प्रमाणपत्र’ (Permanent Resident Certificate – PRC) जारी करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार का दावा है कि इससे वैध वोटरों के नाम लिस्ट से कटने से बचेंगे, लेकिन विपक्षी दल बीजेपी (BJP) ने इसे असंवैधानिक बताते हुए सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से दखल देने की मांग कर दी है। आइए जानते हैं क्या है यह पूरा विवाद और क्यों इस सर्टिफिकेट पर रार मची है।
क्या होता है SIR और क्यों पड़ी इस सर्टिफिकेट की जरूरत?
चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चलाता है, जिसमें घर-घर जाकर वोटरों का वेरिफिकेशन किया जाता है। कई बार पर्याप्त दस्तावेज़ न होने के कारण वैध नागरिकों के नाम भी लिस्ट से बाहर हो जाते हैं। इसी का हल निकालने के लिए कर्नाटक सरकार ने 2026 के इस अभियान के लिए ‘परमानेंट रेजिडेंट सर्टिफिकेट’ (PRC) नियम पेश किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को एक वैध निवास प्रमाण पत्र देना है जो सालों से कर्नाटक में रह रहे हैं, ताकि वे वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वा या बचा सकें।
किसे मिलेगा यह सर्टिफिकेट? ये हैं नियम और शर्तें
कर्नाटक सरकार के नए नियमों के मुताबिक, इस प्रमाणपत्र को पाने की प्रक्रिया को काफी सरल और जनता के अनुकूल बनाया गया है। इसके लिए कुछ खास पात्रता मानदंड (Eligibility Criteria) तय किए गए हैं:
10 साल का निवास: आवेदक या उसके माता-पिता/पति-पत्नी कर्नाटक में पिछले 10 साल से लगातार रह रहे हों।
शिक्षा: आवेदक ने कर्नाटक के किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कम से कम 10 साल (12वीं या समकक्ष तक) पढ़ाई की हो।
संपत्ति: राज्य में खुद की या परिवार की कोई अचल संपत्ति या घर होना चाहिए।
सरकारी दस्तावेज: आधार कार्ड, राशन कार्ड, रेवेन्यू रिकॉर्ड या पुरानी वोटर लिस्ट के जरिए भी दावा मजबूत किया जा सकता है। सरकार ने यह भी साफ किया है कि डिजिटल बुनियादी ढांचे के साथ हर ग्राम पंचायत और वार्ड ऑफिस में हेल्प डेस्क बनाई जाएगी, ताकि लोग आसानी से सेवा सिंधु पोर्टल के जरिए आवेदन कर सकें।
बीजेपी को क्यों है आपत्ति? राष्ट्रीय सुरक्षा का दिया हवाला
इस नए नियम के आते ही केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस सरकार का यह कदम असंवैधानिक है क्योंकि भारत में एकल नागरिकता (Single Citizenship) का प्रावधान है और राज्य सरकार अपनी मर्जी से ‘स्थायी निवासी’ की अलग श्रेणी नहीं बना सकती।
विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह है कि बिना केंद्रीय एजेंसियों की जांच के, स्थानीय रेवेन्यू अधिकारियों के जरिए यह सर्टिफिकेट बांटने से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों और घुसपैठियों को भारत की नागरिकता और वोटिंग का अधिकार मिल सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
निष्कर्ष
कर्नाटक सरकार का यह फैसला जहां एक तरफ आम नागरिकों और प्रवासियों के लिए वोटर लिस्ट में नाम बनाए रखने का आसान जरिया दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह कानूनी और संवैधानिक पेचों में फंसता नजर आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग (ECI) राज्य सरकार द्वारा इतने सरल नियमों के तहत बनाए गए इस डोमीसाइल या पीआरसी (PRC) को वोटर वेरिफिकेशन के लिए पूरी तरह स्वीकार करेगा या नहीं। आने वाले दिनों में यह विवाद अदालत के दरवाजे तक भी पहुंच सकता है।
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