दिल्ली हाईकोर्ट ने राजीव गांधी फाउंडेशन को RTI के दायरे में लाने की याचिका खारिज की
नई दिल्ली, 17 अगस्त 2026। दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी फाउंडेशन (RGF) को सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ घोषित करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता के कई तारीखों पर पेश न होने को भी नोट किया।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
यह याचिका दिल्ली के अधिवक्ता शनमुगा पात्रो ने दायर की थी, जिसमें उन्होंने 15 अक्टूबर 2010 के मुख्य सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें फाउंडेशन को सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि फाउंडेशन को सरकार से धन प्राप्त होता है और यह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक गतिविधियों में लगा है, इसलिए यह सार्वजनिक प्राधिकरण की विशेषता रखता है।
फाउंडेशन की दलील और अदालत का फैसला
फाउंडेशन की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि RGF किसी सरकारी अधिसूचना या आदेश द्वारा स्थापित नहीं किया गया है, इसलिए यह सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि फाउंडेशन को सरकार से केवल चार प्रतिशत (4%) फंडिंग मिलती है, जो उसके कुल बजट की तुलना में “नगण्य” है, और इस कारण यह RTI अधिनियम की धारा 2(h) के दायरे में नहीं आता।
गौरतलब है कि इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले RGF को अपने वार्षिक लेखापरीक्षित खाते पेश करने का निर्देश दिया था, ताकि यह तय किया जा सके कि संगठन RTI के दायरे में आता है या नहीं। सूचना आयोग ने अपने 2010 के फैसले में स्पष्ट किया था कि RTI अधिनियम की धारा 2(h) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण बनने के लिए, किसी संस्था का सरकार द्वारा ‘स्वामित्व, नियंत्रित या पर्याप्त रूप से वित्त पोषित’ होना आवश्यक है।
अदालत ने फाउंडेशन की दलील को स्वीकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। RGF की स्थापना 21 जून 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदर्शों और देश के प्रति उनके दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। फाउंडेशन वंचित बच्चों, महिलाओं और अन्य हाशिए के समूहों के विकास के लिए कई परियोजनाएं चलाता है। हालांकि, याचिकाकर्ता द्वारा फाउंडेशन को RTI के दायरे में लाने की लंबी कानूनी लड़ाई अब फिलहाल समाप्त हो गई है।
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