सुप्रीम कोर्ट का सख्त फैसला, रिहायशी इलाकों में कमर्शियल काम बैन
शीर्ष अदालत की अधिकारियों को दोटूक: “समय बीत जाने से अवैधता ठीक नहीं हो जाती”; आदेश न मानने पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी
📍 नई दिल्ली | राष्ट्रीय विशेष रिपोर्ट
देशभर के रिहायशी इलाकों में अवैध रूप से संचालित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ तुरंत बुलडोजर और सीलिंग की कार्रवाई होगी। अदालत ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि “समय बीत जाने से कोई अवैधता वैध नहीं हो जाती।”
अधिकारियों की लापरवाही पर अवमानना (Contempt) की कार्यवाही; मप्र सरकार की समिति पर रोक।
पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने नागरिक निकायों (Civic Bodies) के माध्यम से अवैध निर्माणों की पहचान कर बिना किसी देरी के उन्हें ध्वस्त करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शीर्ष अदालत के आदेशों के क्रियान्वयन हेतु एक पृथक समिति गठित करने के फैसले को “अवमाननाजनक” करार देते हुए उस पर तुरंत रोक लगा दी।
🏫 जयपुर व लखनऊ के कोचिंग संस्थानों और पटना नगर निगम पर चाबुक
अदालत ने रिहायशी इलाकों में अवैध रूप से चल रहे कोचिंग सेंटरों के मुद्दे पर कड़ा संज्ञान लिया। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को 3 सप्ताह के भीतर रिहायशी इलाकों में चल रहे कोचिंग संस्थानों पर बुलडोजर चलाने का अल्टीमेटम दिया गया है। वहीं, लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 15 छात्रों की मौत के दर्दनाक मामले में लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के उपाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब करते हुए अवमानना का नोटिस जारी किया गया है।
पटना के नौज़ार घाट से नूरपुर घाट तक गंगा किनारे बने अवैध निर्माण 6 सप्ताह में हटाने का आदेश।
बिहार के संदर्भ में, पटना नगर निगम द्वारा केवल 7,257 नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को कोर्ट ने “जिम्मेदारी से भागना” बताया। इसके अतिरिक्त, बिहार सरकार को पटना के नौज़ार घाट और नूरपुर घाट के बीच गंगा नदी के डूब क्षेत्र (Floodplain) में बने सभी अवैध निर्माणों और पक्के अतिक्रमणों को 6 सप्ताह के भीतर पूरी तरह ध्वस्त करने का आदेश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर राज्यों ने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की, तो संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों (Chief Secretaries) को सीधे कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा। इस ऐतिहासिक आदेश से शहरी नियोजन और मास्टर प्लान के उल्लंघन पर नकेल कसना तय माना जा रहा है।


