छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना नए तथ्य के FIR दर्ज करना संविदात्मक विवाद को आपराधिक रंग देना, याचिका स्वीकार कर FIR रद्द
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि पुलिस किसी शिकायत को शुरू में गैर-संज्ञेय विवाद मानकर कार्रवाई करती है और फिर बिना किसी नए तथ्य के उसी आरोप पर FIR दर्ज कर लेती है, तो यह साबित करता है कि मूलतः कारोबारी या संविदात्मक विवाद को आपराधिक रंग देने का प्रयास किया गया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) और 3(5) के तहत दर्ज FIR को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता और उसके सहयोगियों से कथित तौर पर ₹1,02,480 जमा कराए गए थे और उन्हें ₹22,000 मासिक वेतन पर सेल्समैन/एजेंट नियुक्त करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बाद में यह वादा पूरा नहीं किया गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने 18 सितंबर 2025 को पुलिस में शिकायत दी थी, जिसे पुलिस ने गैर-संज्ञेय मानते हुए धारा 155 CrPC (अब धारा 174 BNSS) के तहत कार्रवाई की और शिकायतकर्ता को सक्षम न्यायालय जाने की सलाह दी।
बिना नई सामग्री के दो दिन बाद दर्ज हुई FIR
हालांकि, महज दो दिन बाद, 20 सितंबर 2025 को उसी शिकायत और आरोपों के आधार पर, बिना किसी नई सामग्री के FIR दर्ज कर ली गई। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता ने Direct Seller Agreements किए थे, जिनमें ₹22,000 मासिक वेतन या भोजन-आवास का कोई प्रावधान नहीं था। अदालत ने कहा कि मामला मूल रूप से व्यावसायिक और संविदात्मक विवाद था, न कि आपराधिक मामला।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के लिए शुरुआत से बेईमान मंशा का होना जरूरी है। सिर्फ किसी वादे को पूरा न करना या अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन, अगर शुरुआत में धोखाधड़ी की मंशा न हो, तो वह आपराधिक दायित्व नहीं बनाता। अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि रिकॉर्ड में इस बदलाव को समझाने वाली कोई ठोस सामग्री नहीं है। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर FIR को रद्द कर दिया।
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है जहां पुलिस प्रारंभिक जांच के बाद भी बिना किसी नए सबूत के आपराधिक प्रक्रिया शुरू कर देती है। अदालत का यह रुख साफ करता है कि व्यावसायिक अनुबंधों के उल्लंघन को आपराधिक मुकदमों में बदलना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इस निर्णय से उन व्यापारियों और कंपनियों को राहत मिलेगी जो संविदात्मक विवादों में फंसकर आपराधिक मुकदमों का सामना करते हैं।
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