
बिहार के सारण (छपरा) में कश्मीरी ‘पंचमुखी सेब’ की खेती का ट्रायल पूरी तरह सफल रहा है। स्थानीय मौसम में इस खास सेब के उत्पादन से किसानों में भारी उत्साह है।
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बिहार के कृषि क्षेत्र से एक बेहद सुखद और क्रांतिकारी खबर सामने आई है। पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने की चाह रखने वाले सारण (छपरा) जिले के प्रगतिशील किसानों ने एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है। कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में सारण की मिट्टी और जलवायु में कश्मीरी ‘पंचमुखी सेब’ की खेती का किया गया प्रायोगिक परीक्षण (ट्रायल) पूरी तरह से सफल रहा है। आमतौर पर केवल ठंडे और पहाड़ी इलाकों में होने वाले सेब की फसल का बिहार के मैदानी इलाकों में इस तरह लहलहाना कृषि क्षेत्र के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि माना जा रहा है।
इस परीक्षण की सफलता के बाद स्थानीय कृषि विभाग और किसानों में भारी उत्साह का माहौल है। विशेषज्ञों का कहना है कि पंचमुखी सेब की यह विशेष प्रजाति गर्म और मध्यम तापमान वाले क्षेत्रों के अनुकूल विकसित की गई है। सारण के मौसम को सहन करते हुए पौधों में न केवल बेहतरीन फ्लावरिंग (फूल आना) हुई, बल्कि फलों का आकार और गुणवत्ता भी बेहद शानदार पाई गई है। इस सफल ट्रायल ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, तो बिहार की उपजाऊ मिट्टी में किसी भी नकदी फसल का बंपर उत्पादन किया जा सकता है।
इस कश्मीरी पंचमुखी सेब की खासियत और सारण में इसके उत्पादन से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित क्रमानुसार हैं
तापमान और मिट्टी का अनुकूलन: पंचमुखी सेब की यह किस्म अधिकतम 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को सहने की क्षमता रखती है। सारण जिले की बलुई दोमट मिट्टी इस पौधे के विकास और जल निकासी के लिए बेहद उपयुक्त साबित हुई है।
लागत और मुनाफा: पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं की तुलना में सेब की खेती में शुरुआती लागत थोड़ी अधिक आती है, लेकिन एक बार पौधा तैयार हो जाने के बाद यह कई दशकों तक फल देता है। इससे किसानों की आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
स्थानीय बाजार को बढ़ावा: बिहार में सेब का सफल उत्पादन होने से राज्य को बाहरी मंडियों (जैसे कश्मीर या हिमाचल) पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे परिवहन का खर्च बचेगा और स्थानीय उपभोक्ताओं को बेहद कम कीमत पर ताजे और केमिकल-मुक्त सेब मिल सकेंगे।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, सारण में इस ट्रायल की सफलता के बाद अब इसे जिले के अन्य प्रखंडों में भी बड़े पैमाने पर विस्तारित करने की योजना बनाई जा रही है। विभाग द्वारा इच्छुक किसानों को इस खास प्रजाति के पौधे और तकनीकी प्रशिक्षण (Technical Training) भी उपलब्ध कराया जाएगा। कश्मीरी सेब की इस सफलता ने बिहार के किसानों के लिए समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं, जिससे आने वाले समय में राज्य के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।
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